Wednesday, 1 February 2012

बसंती हाइकु


  • रंग बसंत
    निखरी हर दिशा
    रूप अनंत

Thursday, 19 January 2012


खुद सुबह सर्दी से ठिठुरती

अलसाई अलसाई

पिछवाड़े की झाड़ियों में अटकी हुई

कोहरे के चादर में मुँह छिपा 

इतनी सिकुड़ गयी है

घबरा कर बाहर आ कर

चाय की चुस्की लेने से भी

डर गयी  है
बनता ही रहता है नज़मों का ताजमहल तब तक
रहे लफ़्जों की महक कागज़ के बदन पर जब तक